मैं अपने ब्लॉग में कुछ भी ऐसा नही लिखना चाहता था जिसमें किसी व्यक्ति के प्रति आक्षेप हो ,लेकिन बात गंभीर है और एक महत्वहीन व्यक्ति द्वारा अनावश्यक रूप से पैदा की गई गड़बडियों की क्षतिपूर्ति तो करनी ही होगी।
महाराष्ट्र में जो कुछ हो रहा है निकृष्ट है ।' महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ' के गुंडे अव्यवस्था फैला रहे हैं और यह सब हो रहा है उनके नेता राज ठाकरे के निर्देशों पर । महाराष्ट्र सरकार घबराई हुए है ,केन्द्र सरकार चुप है ,लोगों में तो साहस रहा ही नहीं,और शायद बौद्धिकों के लिए यह कोई मुद्दा ही नहीं है । ऐसा नही है कि कोई चर्चा नहीं हो रही । हो रही है लेकिन फुसफुसाहट भरे लहजे में । अरे ये भी कोई बात हुई, एक गैरजिम्मेदार शख्स हमें बताएगा कि हमें कौन सी भाषा बोलनी है कौन सी नहीं ।राज ठाकरे होते कौन हैं?जो आदमी देश को कमजोर करेगा ,महज अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए वो मेरा निजी दुश्मन है । मैं विचारों की आजादी का समर्थक हूँ और सारी भाषाओँ का सम्मान करता हूँ । लेकिन ये हर कोई जानता है की राज क्या हैं और क्या चाहते हैं।
क्या लिखूं ?कुछ लिखने के लिए है क्या ?लोकतंत्र का अपमान इन लोगों ने नहीं किया है ,अपमान हमने किया है । सच तो यही है कि हम शायद अभी तक लोकतंत्र के काबिल हुए ही नहीं हैं ।शर्म की बात हमारे लिए है ,हम पर वैसा ही शासन होता है जिसके काबिल हम होते हैं।आज MNS कुछ भी नहीं है फ़िर भी हंगामा खड़ा हुआ है ।मैं मराठी लोगों से आग्रह करूँगा कि अपने मन में किसी तरह की संकीर्णता न पालें । विरोध करें, सड़कों पर उतरें और अपना मत रखें कि हमारे देश में राष्ट्रभाषा बोलना कोई अपराध नहीं है । आदर्श तो यही होगा कि विरोध स्वयं मराठी ही करें ।
Saturday, September 13, 2008
Saturday, September 6, 2008
आओ शिव को विष पिलायें!
पुराणों की कुछ कथाएँ बड़ी ही दिलचस्प हैं ,आँखें खोल देने वाली हैं . लेकिन उन्हें सीधे सीधे वैसे ही न लें जैसे उन्हें लिखा या कहा गया है ।पुराणों के साथ एक बहुत ही गंभीर समस्या रही है ,वो ये की इन्हें रचने वालो का कोई न कोई उद्देश्य रहा है । सार तो प्रत्येक अच्छी कथा में होना चाहिए लेकिन यहाँ कुछ 'विशिष्ट' प्रयोजन रहे हैं । सन्दर्भ है समुद्र मंथन का जब बहुत सी मूल्यवान वस्तुओं के साथ 'हलाहल' निकला , महाभयंकर विष जो संभाले नहीं संभल रहा था । देवता तो हमेशा से ही स्वार्थी रहे हैं,और फ़िर उन में उस विष को सम्हालने का न तो साहस था और न ही क्षमता ।अंत में शिव के पास विनती लेकर जाते हैं , शिव का क्या है वे तो त्यागी हैं योगी हैं ,सहज मान गए और विष पी लिया । ध्यान दें यहाँ समुद्र मंथन से प्राप्त कोई अन्य वस्तु शिव को अर्पित नहीं की गई लेकिन उनसे विष पीने को कहा गया ।
और ये समुद्र मंथन क्या था। एक इशारा है कि प्रकृति के दोहन से बहुमूल्य चीजों के साथ-साथ विनाशकारी विष भी निकलता हैं। ठीक वैसे ही जैसे अभी हो रहा है । प्रदूषण,ग्लोबल वार्मिंग ,ये सब हलाहल ही हैं । और अब कोई शिव नहीं आयेगे । खैर मेरे कहने का आशय यह था कि हम चाहते हैं कि 'कोई' आए और हमारी विपदाओं को अपने सर ले ले । हमने अवतारों की कहानियाँ बुनी ,महापुरुषों में देवत्व थोपा । लेकिन ख़ुद में कभी इतना साहस नहीं आया कि एक इकाई के तौर पर अपने आप को बदल दें ।
और ऐसा करना बेहद सुविधाजनक था; किसी और को कोसना चाहे वो व्यवस्था हो या समाज। superhero कोई फैंटेसी नहीं है , वो हम सब में मौजूद है । बदलाव की ताकतें हमारे अन्दर ही है ।पहचानो उसे । इसके लिए तुम्हें बस इतना साहस चाहिए की तुम स्वयं को अपनी सम्पूर्ण नग्नता में देख सको ।अपने भय और अपनी कमजोरियों को देखो , बिना किसी आवरण के । अब विष पिलाने के लिए किसी शिव को मत ढूंढो । शिव हो जाने में ही शिव का सम्मान है । यही शिवत्व है ,यही तुम हो ।
और ये समुद्र मंथन क्या था। एक इशारा है कि प्रकृति के दोहन से बहुमूल्य चीजों के साथ-साथ विनाशकारी विष भी निकलता हैं। ठीक वैसे ही जैसे अभी हो रहा है । प्रदूषण,ग्लोबल वार्मिंग ,ये सब हलाहल ही हैं । और अब कोई शिव नहीं आयेगे । खैर मेरे कहने का आशय यह था कि हम चाहते हैं कि 'कोई' आए और हमारी विपदाओं को अपने सर ले ले । हमने अवतारों की कहानियाँ बुनी ,महापुरुषों में देवत्व थोपा । लेकिन ख़ुद में कभी इतना साहस नहीं आया कि एक इकाई के तौर पर अपने आप को बदल दें ।
और ऐसा करना बेहद सुविधाजनक था; किसी और को कोसना चाहे वो व्यवस्था हो या समाज। superhero कोई फैंटेसी नहीं है , वो हम सब में मौजूद है । बदलाव की ताकतें हमारे अन्दर ही है ।पहचानो उसे । इसके लिए तुम्हें बस इतना साहस चाहिए की तुम स्वयं को अपनी सम्पूर्ण नग्नता में देख सको ।अपने भय और अपनी कमजोरियों को देखो , बिना किसी आवरण के । अब विष पिलाने के लिए किसी शिव को मत ढूंढो । शिव हो जाने में ही शिव का सम्मान है । यही शिवत्व है ,यही तुम हो ।
Saturday, August 30, 2008
हमें कौन कैंसर दे रहा है?
खाद्य सामग्री में मिलावट कितनी खतरनाक हो सकती है ये बात शायद सभी जानते हैं लेकिन कोई कुछ करता क्यों नहीं ?क्या आपने कभी फलों को गौर से देखा है ? आजकल पपीता ज्यादा मीठा होने लगा है और उसमें बीज भी नहीं दिखता ?तरबूज ज्यादा लाल रहता है,केले वक्त से पहले पक गए लगते हैं .ये सब क्या है ?इन सब में जहर डाला गया है । ये बढ़ा चढ़कर कही गई बात नहीं है । जो आपको कैंसर दे वो ज़हर ही तो है न । जिन रसायनों का इस्तेमाल मिलावट में किया जाता है वाकई इस हद तक घातक होते हैं।फलों को कृत्रिम रूप से पकाने के लिए कैल्शियम कार्बाइड का इस्तेमाल किया जाता है ,जिसमें कि फास्फोरस और आर्सेनिक की मात्रा पाई जाती है ।
कैल्शियम कार्बाइड पानी में घुलने पर ऐसिटिलीन गैस बनाता है जो फलों को जल्दी पकाने में मदद करता है ,लेकिन यही ऐसिटिलीन दिमाग में ऑक्सीजन की आपूर्ति कम करके नर्वस सिस्टम को प्रभावित करती है । बताने की जरूरत नहीं कि इस तरह फल पकाने पर कई देशों में प्रतिबन्ध है । लेकिन हमारे यहाँ यह खूब होता है ।
इस तरह के प्रतिबन्ध किसी को रोक नहीं पाते जब हमें ही कोई फ़िक्र नहीं ।
रंगों पर आपने गौर किया होगा। मिठाइयों या केक में जो हरा , नारंगी या लाल रंग होता है उनमें ताम्बे और आर्सेनिक यौगिक मिले होते हैं ।
हल्दी में रंगीन चॉक या ईंटो का पाउडर ,धनिया में लकड़ी का बुरादा, घोडे की लीद वगैरह मिलाये जाते हैं । और भी बहुत कुछ हैं मिलाने के लिए और मिलाये जाते हैं लेकिन सवाल ये उठता है की कोई विरोध क्यों नहीं करता ।
मसाले तो हम ब्रांडेड खरीद लेते हैं जो एक बेहतर चुनाव है लेकिन फल सब्जियों का क्या करें ?क्या आपने परवल पर हरा रंग लगा नहीं देखा ,मैं तो मना कर देता हूँ और सब्जी वाले को समझाइश भी दे देता हूँ ,लेकिन वो भी क्या करे ,उसे ऐसा ही मिला है और वह बेच रहा है । लेकिन फर्क पड़ता है , अगर हम खरीदना बंद कर दें तो ये सब कम हो सकता है । हर जगह जाँच नहीं की जा सकती लेकिन जहाँ साफ साफ दिख रहा है वहां अपनी बात रखें ,रंगी हुए चीजें न लें हमेशा चॉकलेट या सफ़ेद केक खरीदे ,और विक्रेता को बताएं की आप क्यों ऐसा कर रहे हैं।
मुझे दूध पीने वाले बच्चों पर तरस आता है,वे नहीं जानते की उनका दूध कैसे 'तैयार' किया जाता है। अगर आप कभी सहस कर पायें तो एक बार दूध का लैब परीक्षण जरूर करवाएं ।ज्यादा सम्भावना यही है की दूध मिलावटी होगा । और दूध में पानी मिलाना अब कोई मिलावट नही कहलाती है । शैंपू,साबुन और यूरिया मिलाया जाता है ।
यकीन मानिये हम इसे रोक सकते हैं ,सजग रहकर ,आवाज़ उठाकर हमें इसका प्रतिरोध करना चाहिए ।
कैल्शियम कार्बाइड पानी में घुलने पर ऐसिटिलीन गैस बनाता है जो फलों को जल्दी पकाने में मदद करता है ,लेकिन यही ऐसिटिलीन दिमाग में ऑक्सीजन की आपूर्ति कम करके नर्वस सिस्टम को प्रभावित करती है । बताने की जरूरत नहीं कि इस तरह फल पकाने पर कई देशों में प्रतिबन्ध है । लेकिन हमारे यहाँ यह खूब होता है ।
इस तरह के प्रतिबन्ध किसी को रोक नहीं पाते जब हमें ही कोई फ़िक्र नहीं ।
रंगों पर आपने गौर किया होगा। मिठाइयों या केक में जो हरा , नारंगी या लाल रंग होता है उनमें ताम्बे और आर्सेनिक यौगिक मिले होते हैं ।
हल्दी में रंगीन चॉक या ईंटो का पाउडर ,धनिया में लकड़ी का बुरादा, घोडे की लीद वगैरह मिलाये जाते हैं । और भी बहुत कुछ हैं मिलाने के लिए और मिलाये जाते हैं लेकिन सवाल ये उठता है की कोई विरोध क्यों नहीं करता ।
मसाले तो हम ब्रांडेड खरीद लेते हैं जो एक बेहतर चुनाव है लेकिन फल सब्जियों का क्या करें ?क्या आपने परवल पर हरा रंग लगा नहीं देखा ,मैं तो मना कर देता हूँ और सब्जी वाले को समझाइश भी दे देता हूँ ,लेकिन वो भी क्या करे ,उसे ऐसा ही मिला है और वह बेच रहा है । लेकिन फर्क पड़ता है , अगर हम खरीदना बंद कर दें तो ये सब कम हो सकता है । हर जगह जाँच नहीं की जा सकती लेकिन जहाँ साफ साफ दिख रहा है वहां अपनी बात रखें ,रंगी हुए चीजें न लें हमेशा चॉकलेट या सफ़ेद केक खरीदे ,और विक्रेता को बताएं की आप क्यों ऐसा कर रहे हैं।
मुझे दूध पीने वाले बच्चों पर तरस आता है,वे नहीं जानते की उनका दूध कैसे 'तैयार' किया जाता है। अगर आप कभी सहस कर पायें तो एक बार दूध का लैब परीक्षण जरूर करवाएं ।ज्यादा सम्भावना यही है की दूध मिलावटी होगा । और दूध में पानी मिलाना अब कोई मिलावट नही कहलाती है । शैंपू,साबुन और यूरिया मिलाया जाता है ।
यकीन मानिये हम इसे रोक सकते हैं ,सजग रहकर ,आवाज़ उठाकर हमें इसका प्रतिरोध करना चाहिए ।
Monday, August 25, 2008
होम्योपैथी काम करती है
कुछ समय से मुझे स्वास्थ्य समस्याओं ने परेशान कर रखा था , कभी कभी मामूली नज़र आने वाली समस्याएं बहुत कष्ट देती हैं । मुझे allergy के कारण साँस लेने में परेशानी होती थी । लगता था जैसे कभी न जाने वाला जुकाम हो गया हो , इधर -उधर इलाज कराने के बाद होम्योपैथी के बारे में सोचा ,और नतीजा बहुत अच्छा रहा ।मुझे उम्मीद नहीं थी की इतना तेज़ और असरदार साबित होगा ।होम्योपैथी में कुछ रोगों का बहुत ही सटीक और निर्दोष इलाज है ,जो कि असर और दुष्प्रभाव दोनों के मामलों में allopathy से बेहतर है ।piles ,allergy,asthma ,lucoderma जैसी बीमारियों में यह बेहद कारगर है . रह -रहकर होने वाले संक्रमण कमजोर immunity के कारण होते हैं , होम्योपैथी सीधे immunity को दुरुस्त करती है।पूरी दुनिया में होम्योपैथी को अब गंभीरता से लिया जाने लगा है खासतौर से भारत में इसकी सम्मानजनक स्थिति है , लेकिन homeopath ही इसके दुश्मन बने हुए हैं ,एक कारण तो यह है कि इन में से कई practitioner qualified नहीं हैं या फ़िर अपने पेशे के साथ न्याय करने के काबिल नहीं हैं । प्रिस्क्रिप्शन न देना दूसरा बड़ा कारण है । इससे विश्वसनीयता तो कम होती ही है साथ ही मरीज़ के पास कोई रिकॉर्ड नहीं होता ।
लेकिन फ़िर भी मैं होम्योपैथी की वकालत करता हूँ ,खासतौर से उन बीमारियों के मामलों में जिनका होम्योपैथी में कारगर इलाज है। आप भी एक बार जरूर आजमाकर देखें ।
लेकिन फ़िर भी मैं होम्योपैथी की वकालत करता हूँ ,खासतौर से उन बीमारियों के मामलों में जिनका होम्योपैथी में कारगर इलाज है। आप भी एक बार जरूर आजमाकर देखें ।
Monday, August 18, 2008
नायकत्व और युवा
नायकत्व की परिभाषा बदल रही है ,और युवाओं का चरित्र भी । बदलती हुई आर्थिक तस्वीर बहुत कुछ बदल रही है । युवा आइन्स्टीन के 'सापेक्षता के सिद्धांत' की लाज रख रहे हैं । समय के सापेक्ष चल रहे हैं।क्या हम सब क्लोन नहीं बनते जा रहे हैं ,सब के सब एक जैसे खोखले ,व्यक्तित्व शून्य इन्सान, जिन्हें समाज ने गढा है ।समकालीन फिल्मों के नायक ग्रे शेड के साथ आते हैं । खलनायक और नायक का भेद मिट रहा है । आज का नायक कितना स्वार्थी हो गया है,और मजेदार बात ये कि बावजूद इसके वो नायक है । वास्तव में नायक कहना सही नहीं होगा ,उसे अब केन्द्रीय पात्र ही कहना चाहिए । क्योंकि नायकों वाली संवेदना तो कबकी जा चुकी है। हाँ कुछ फिल्में इस तथ्य को झुठलाती हुई यदा कदा आ जाती हैं , जो हवा के ठंडे झोंके की तरह होती हैं ,लेकिन उनकी तादात ज्यादा नहीं है । ८० के दशक की फिल्मों से तुलना तो नहीं कर सकते क्योंकि तब से अब तक काफी कुछ बदल चुका है । परिवर्तन बहुत ऐतिहासिक हैं । अब 'एंग्री यंग मैन 'जैसे नायक के लिए कोई जगह नहीं है। आज के नायक के लिए पैसा ही सब कुछ हो गया है ।मुद्दे तो और भी हैं समाज में ,फ़िर आज के चिरकुट नायक की आंखों पर परदा क्यों पड़ा है?ये परदा हमारे नेताओं ने खूब डाला है लेकिन अब फ़िल्म वाले भी हमें मुगालते में रखते हैं ।इतनी अच्छी पाचन शक्ति सिर्फ़ भारत के लोगों में ही हो सकती है । घटिया चीजों को हज़म करने की लम्बी आदत हो चुकी है। अब हम कुछ भी पचा सकते हैं। फ़िर ये तो महज फूहड़ सिनेमा है ।
और आज के युवा को तो बस दो ही बातों की फ़िक्र है अपना करियर या 'सेक्स पार्टनर ' की तलाश । दोनों ही बातें अपने आप में बुरी नहीं हैं । लेकिन ऐसा क्यों है कि दायरा बहुत छोटा हो गया है । ऐसे माहौल में एक तत्व की कमी हो जाती है -साहस की । साहस कैसे आएगा जब नैतिक बल ही न रहेगा । और नैतिकता की परवाह तो तब होगी जब व्यक्ति स्वयं से परे उठे। इस आर्थिक उत्साह में ही मत खो जाना तुम । उत्सव मनाओ ,लेकिन याद रखो जीवन के ऋण तो तुम्हें चुकाने ही पड़ेंगे । ऋण महसूस ही तब होगा जब तुम अपना आत्मसम्मान वापस पाओगे ।
और आज के युवा को तो बस दो ही बातों की फ़िक्र है अपना करियर या 'सेक्स पार्टनर ' की तलाश । दोनों ही बातें अपने आप में बुरी नहीं हैं । लेकिन ऐसा क्यों है कि दायरा बहुत छोटा हो गया है । ऐसे माहौल में एक तत्व की कमी हो जाती है -साहस की । साहस कैसे आएगा जब नैतिक बल ही न रहेगा । और नैतिकता की परवाह तो तब होगी जब व्यक्ति स्वयं से परे उठे। इस आर्थिक उत्साह में ही मत खो जाना तुम । उत्सव मनाओ ,लेकिन याद रखो जीवन के ऋण तो तुम्हें चुकाने ही पड़ेंगे । ऋण महसूस ही तब होगा जब तुम अपना आत्मसम्मान वापस पाओगे ।
Friday, July 4, 2008
अशांति का एक और दौर.
जम्मू कश्मीर में विरोध प्रदर्शन ,विहिप का बंद और मुलायम सिंह का एटॉमिक मसले पर रुख बदलना ये सारी घटनाएँ एक ही बात की तरफ़ इशारा करती हैं की हमारा लोकतंत्र कितना अपरिपक्व है।अमरनाथ मसला हालाँकि संवेदनशील है लेकिन जब जम्मू में ही इतना विरोध हो रहा था तो फ़िर पूरे देश को 'बंद' करना कहाँ तक तार्किक था । जैसा अंदेशा था वैसा हुआ भी । इंदौर में दंगों में लोग मारे गए ,मरने वाले लोग कौन थे ये बताने की जरूरत नहीं । मुद्दा कोई भी हो आम आदमी ही मारा जाता है ।कोई अपनी रोज़ी के लिए निकलता है तो कोई किसी और मज़बूरी में और बस लौट कर आना नहीं हो पाता ,उन्हें रास्ते में होई मार दिया जाता है कोई पुलिस की गोली का शिकार होता है तो कोई किसी की नफरत का ।और पुलिस भी करे तो क्या ?कभी कभी शान्ति बहाल करने का और कोई उपाय दिखता नहीं है । लेकिन ये मसले राजनीती से प्रेरित ज्यादा होते हैं ,और पहचान को मुद्दा बनाया जाता है । आप को डराया जाता है कि आप सुरक्षित नहीं हैं या कि आप जिस समुदाय के सदस्य हैं उस पर आंच आ रही है और आप को अपना बचाव करना है । ये जो दंगे खड़े किए जाते हैं उनमें किन लोगों को इस्तेमाल किया जाता है -गरीब बेरोजगार लड़के जिनके पास न कुछ खोने को है और न ही भविष्य कि कोई उम्मीद । इहें भरोसा दिलाया जाता है कि ये अपनी पशुता जैसे चाहें वैसे निकल सकते हैं और भीड़ में इनकी कोई पहचान नहीं रहेगी ,वे ऐसा करते भी हैं ,कोई 'रिवार्ड' की उम्मीद न भी हो तो भी ये अपनी कुंठा और आक्रोश तो निकल ही सकते हैं ।
और कुछ धार्मिक अतिवादी चाहे वो हिंदू हो या मुसलमान उतर पड़ते हैं । उन्हें वास्तव में धर्मं का लिहाज़ नहीं होता लेकिन वे 'दूसरो' को बर्दाश्त नहीं कर सकते । ये लोग कितना पालन करते हैं अपने धर्म का हम सब जानते हैं। क्यों हम लोग इन 'चुनिन्दा' मूर्खों को बर्दाश्त करते हैं, इनके इशारों पर नाचते हैं । अपना आत्म सम्मान खो बैठे हैं । दूसरो के कहने पर बहुत चल चुके । बहुत इस्तेमाल किया जा चुका है आम आदमी का । अब तो अपनी कुछ इज्ज़त करो । अपनी जिंदगी इतनी मामूली बातों पर खर्च मत करो ।
और उधर एक मौका परस्त नेता मुलायम सिंह को देखो.उन्हें अचानक क्या हो गया की परमाणु समझौते का समर्थन करने लगे ।और बात क्या करते हैं कि मनमोहन सिंह अगर उन्हें इस बात का यकीन दिला देते हैं की यह समझौता देश के हित में है तो वे समर्थन देने के लिए तैयार हैं । यह कैसी बचकानी बात है, मुलायम कहाँ थे अब तक ,कहाँ सो रहे थे । जब मनमोहन सिंह ने संसद में अपना पक्ष रखा था तब सारी बात स्पष्ट हो गई थी ,इसके अलावा भी इस मुद्दे को कई बार स्पष्ट किया जा चुका है ,तब मुलायम के दिमाग में बात नहीं गई । मैं बेशक इस समझौते के पक्ष में हूँ लेकिन आप बातों पर गौर कीजिये । कितने बेगैरत हैं हमारे नेता । किसी भी तरह सत्ता चाहिए इन्हें । यहाँ जम्मू मुद्दा और मुलायम सिंह का ज़िक्र एक साथ इसलिए किया है कि दोनों बातें एक सी हैं दोनों राजनीतिक हैं ।इन घटिया लोगों पर हम क्यों अपनी जान कुर्बान करें । लेकिन ऐसा हो रहा है । और जम्मू में एक बहुत ही खतरनाक हादसा हो चुका है । लोगों ने दवाब डालकर सरकार को मज़हबी मुद्दे पर झुका लिया है । अब इस से अलगाव कि आग को हवा ही मिलेगी ।
सोचता हूँ कि क्या होगा ................................ ?
और कुछ धार्मिक अतिवादी चाहे वो हिंदू हो या मुसलमान उतर पड़ते हैं । उन्हें वास्तव में धर्मं का लिहाज़ नहीं होता लेकिन वे 'दूसरो' को बर्दाश्त नहीं कर सकते । ये लोग कितना पालन करते हैं अपने धर्म का हम सब जानते हैं। क्यों हम लोग इन 'चुनिन्दा' मूर्खों को बर्दाश्त करते हैं, इनके इशारों पर नाचते हैं । अपना आत्म सम्मान खो बैठे हैं । दूसरो के कहने पर बहुत चल चुके । बहुत इस्तेमाल किया जा चुका है आम आदमी का । अब तो अपनी कुछ इज्ज़त करो । अपनी जिंदगी इतनी मामूली बातों पर खर्च मत करो ।
और उधर एक मौका परस्त नेता मुलायम सिंह को देखो.उन्हें अचानक क्या हो गया की परमाणु समझौते का समर्थन करने लगे ।और बात क्या करते हैं कि मनमोहन सिंह अगर उन्हें इस बात का यकीन दिला देते हैं की यह समझौता देश के हित में है तो वे समर्थन देने के लिए तैयार हैं । यह कैसी बचकानी बात है, मुलायम कहाँ थे अब तक ,कहाँ सो रहे थे । जब मनमोहन सिंह ने संसद में अपना पक्ष रखा था तब सारी बात स्पष्ट हो गई थी ,इसके अलावा भी इस मुद्दे को कई बार स्पष्ट किया जा चुका है ,तब मुलायम के दिमाग में बात नहीं गई । मैं बेशक इस समझौते के पक्ष में हूँ लेकिन आप बातों पर गौर कीजिये । कितने बेगैरत हैं हमारे नेता । किसी भी तरह सत्ता चाहिए इन्हें । यहाँ जम्मू मुद्दा और मुलायम सिंह का ज़िक्र एक साथ इसलिए किया है कि दोनों बातें एक सी हैं दोनों राजनीतिक हैं ।इन घटिया लोगों पर हम क्यों अपनी जान कुर्बान करें । लेकिन ऐसा हो रहा है । और जम्मू में एक बहुत ही खतरनाक हादसा हो चुका है । लोगों ने दवाब डालकर सरकार को मज़हबी मुद्दे पर झुका लिया है । अब इस से अलगाव कि आग को हवा ही मिलेगी ।
सोचता हूँ कि क्या होगा ................................ ?
Sunday, July 15, 2007
तुम युवा हो । कुछ खास मायने हैं इस शब्द के .युवा होना तुम्हारी शारीरिक अवस्था की ही अभिव्यक्ति मात्र नहीं है.यह जीवन का सर्वाधिक उर्जावन पड़ाव है.क्या तुम इस अकूत ताकत को सम्हाल सकते हो?कुछ कर गुजरने की चाह है तुम्हारे मन में ,लेकिन क्या तुम अपने लक्ष्य के प्रति सतर्क हो .तुममें पल प्रतिपल क्या घटता है?क्या तुम इस सब के प्रति जागरूक हो?तुम भीड़ में अपनी पहचान ,अपना व्यक्तित्य क्यों खो देते हो?क्या तुम अपनी रौशनी खुद हो या फिर दिशाहीन भटकते रहते हो अपने अँधेरे मन के बियावान में ?तुम अपने मानक खुद तय करते हो या दुसरे तुम्हें बनाते है.क्या तुममें साहस है उस रास्ते पर चलने का जहाँ लोगों की मान्यता तुम्हें ना मिले.या फिर तुम्हें पता ही नहीं तुम कब अपने आप को किसी और को सौंप देते हो कच्ची मिटटी की तरह,कि कोई भी तुम्हें ढाल दे मनचाहे आकर में ,क्या तुम किसी का उपहास करके इसलिये हँसते हो ताकी दूसरे तुम पर ना हंसें ?
क्या तुम्हारे पास वक्त है ?आत्ममंथन का ?तो चलो यह एक शानदार शुरुआत होगी .हम आगे बढ़ें बेहतर सत्य की ओर !
क्या तुम्हारे पास वक्त है ?आत्ममंथन का ?तो चलो यह एक शानदार शुरुआत होगी .हम आगे बढ़ें बेहतर सत्य की ओर !
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